
अजीत मिश्रा (खोजी)
सिस्टम की ‘बत्ती’ गुल: यहाँ मरीजों की आह पर नहीं, बाबू की ‘चाह’ पर चलता है जनरेटर!
- अस्पताल की ‘लॉगबुक’ पी रही लाखों का तेल, अंधेरे में जनता और भ्रष्टाचार का खेल।
- साहब की ‘चाह’ और बाबू की ‘राह’: जनरेटर चलाने के लिए चाहिए भ्रष्टाचार का आशीर्वाद!
- बस्ती का अजब अस्पताल: यहाँ डॉक्टर से बड़े ‘डीजल वाले बाबू’ हैं।
- मरीजों की आह पर भारी ‘बजरंग’ की मर्जी: कब थमेगा हैरैया अस्पताल का ये तमाशा?
- अंधेर नगरी, चौपट अस्पताल: दो बजे के बाद यहाँ ‘यमराज’ भी छुट्टी पर चले जाते हैं!
- गर्भवती महिलाओं का पसीना और अधिकारियों की तिजोरी: एक कड़वी हकीकत।
- सरकारी अस्पताल या भ्रष्टाचार का अड्डा? जहाँ जनरेटर भी ‘रिश्वत’ मांगता है।
ब्यूरो रिपोर्ट: बस्ती मंडल, उत्तर प्रदेश
बस्ती। साहब! अगर आप उत्तर प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में इलाज कराने जा रहे हैं, तो दवाइयों के साथ-साथ एक हाथ वाला पंखा भी साथ ले जाइएगा। क्योंकि यहाँ बिजली जाना तो नियति है, लेकिन जनरेटर चलना ‘सियासत’ है। बस्ती मंडल के सरकारी अस्पतालों का आलम यह है कि यहाँ जनरेटर मरीजों की जान बचाने के लिए नहीं, बल्कि साहबों की जेब भरने के लिए ‘कागजों’ पर दौड़ता है।
बाबू का ‘पावर’ और बुझता हुआ वेंटिलेटर
हैरैया के 100 बेड वाले एमसीएच (MCH) अस्पताल की कहानी आजकल चर्चा में है। यहाँ एक ऐसे ‘शक्तिशाली’ बाबू विराजमान हैं, जिनकी मर्जी के बिना अस्पताल में पत्ता भी नहीं हिलता, जनरेटर की गरजना तो दूर की बात है। लेबर रूम में महिलाएं प्रसव पीड़ा से तड़पती रहें, तीमारदार पसीने से तर-बतर होकर सिस्टम को कोसते रहें, लेकिन मजाल है कि बाबू जी का दिल पसीज जाए।
बाबू की अपनी गणित है— जनरेटर चलेगा तो डीजल जलेगा, और डीजल जलेगा तो वह ‘मलाई’ कम हो जाएगी जो कागजी रिकॉर्ड की बदौलत साहबों की मेज तक पहुँचती है।
कागजी डीजल का ‘करोड़पति’ खेल
अस्पताल के रिकॉर्ड खंगालिए तो लगेगा कि जनरेटर दिन-रात सेवा में लगा है। रोज 50-60 लीटर तेल का ‘भोग’ लग रहा है। महीने का हिसाब जोड़ें तो लाखों का डीजल हवा में उड़ रहा है, लेकिन हकीकत यह है कि यह धुआं सिर्फ भ्रष्टाचार की फाइलों से निकल रहा है।
व्यंग्य का तीर: > सुना है कि इस ‘कागजी डीजल’ की ताकत इतनी है कि इससे कोई भी अधिकारी करोड़ों की कुर्सियां खरीद सकता है। शायद इसीलिए सीएमएस साहब की आंखें इस अंधेरे में भी सबकुछ ‘चकाचक’ देख रही हैं।
दो बजे के बाद ‘राम भरोसे’ अस्पताल
हैरैया अस्पताल की विडंबना देखिए, दोपहर के दो क्या बजे, अस्पताल मानो किसी वीरान खंडहर में तब्दील हो जाता है। न डॉक्टर, न अल्ट्रासाउंड की सुविधा, न कोई जांच करने वाला। अगर किसी गर्भवती महिला को इमरजेंसी पड़ जाए, तो सुरक्षाकर्मी और नर्सों के अलावा वहां ‘सिस्टम का सन्नाटा’ ही मिलता है।
सवाल तो लाजिमी है:
- क्या जिले के आला अधिकारी इस ‘डीजल घोटाले’ और ‘बाबू राज’ से अनजान हैं?
- क्या जनरेटर सिर्फ कागजों पर लॉगबुक भरने के लिए खरीदा गया है?
- मरीजों के पसीने की कीमत पर अधिकारियों की तिजोरियां कब तक भरती रहेंगी?
बस्ती मंडल के स्वास्थ्य महकमे का निजाम इतना बिगड़ चुका है कि यहाँ ईमानदारी एक ‘दुर्लभ बीमारी’ बन गई है। जब तक कोई सख्त और ईमानदार अधिकारी इन ‘ईंधन चोरों’ की नकेल नहीं कसेगा, तब तक गरीब मरीज अंधेरे में अपनी किस्मत को ही रोता रहेगा। बाबू जी की मर्जी चलती रहेगी और जनरेटर कागजों पर तेल पीता रहेगा।

















